करुणा निधान सन्त शिरोमणि श्री साहिब बाबा

भगवत स्वरूप करुणा मूर्ति प्रेम के प्रत्यक्ष प्रतिबिंब संत शिरोमणि साहिब बाबा को संसार के संपूर्ण प्राणी प्यार से हुजूर कहा करते थे वस्तु : हुजूर के दिव्य शरीर को देख पाना साधारण आंखों का विषय नहीं है मैं हुजूर के दिव्य चरित्रों के विषय में उनके शिष्य, अनुयायी,  तथा भक्तों से जो कुछ भी सुना है उसे भाषा बहय करने की कोशिश कर रहा हूं मैं अपने जीवन काल हुजूर के जिन शिष्य अनुयायी से  वह लोग पूर्ण रूप से निश्छल

छल कपट परपंचो से दूर रहने वाले अत्यंत मृदुभाषी तथा ह्रदय के पवित्र लोग थे यह संभव है कि हुजूर के  जीवन काल में विद्यालयी शिक्षा का अभाव था इस लिए उनके शिष्य तथा अनुयायी कुछ लोग कम पढ़े लिखे थे  परंतु अपने प्रेम करुणा के कारण हुजूर की कृपा से साधना के उच्चतमशिखर पर जहां तक पढ़े लिखे लोगों को पहुंचने के लिए कम से कम एक दशक साधना करनी पड़ेगी  उन शिष्य तथा अनुयायी से मैंने जब भी साहिब बाबा के बारे मैं पूछा या जानने की कोशिस की तो हुजूर का नाम लेते ही उनके चेहरे के कमल कांति खिल उठती थी वो रोते आँखो मे असरू लिए हुजूर के चरित्रों को ऐसे सुनाते थे जैसे किसी नितांत निर्धन व्यक्ति को मणि मणिक तथा हीरे मोती का खजाना मिल गया हो और वो प्रसन्नता से लूट रहे हो हुजूर के चरित्रों को सुनाते सुनाते हैं आंखों में असरू लिए चुप हो जाते थे मानो जैसे  संत शिरोमणि साहिब बाबा को याद करके सहज समाधि में चले गए हो हुजूर के भक्त इतने प्रेमी भोले कि उनसे मिलने के बाद मेरे जीवन का ज्ञान रूपी अहंकार पूर्ण रूप से नष्ट भ्रष्ट हो गया.

पढ़े-लिखे तथा तर्क वादी लोग जहां आधुनिक युग में प्रत्येक बात को विज्ञान तथा तर्क के सिद्धांतों पर  घटित होने के बाद मानते हैं ऐसे विज्ञान तथा तर्क को हुजूर के जीवन काल से आज तक दरबार के लोग दीवाल के ताख पर रख देते हैं साहिब बाबा की समाधि पर आज भी आलोकिक घटनाओं का क्रमवार सिलसिला जारी है मेरा तो नहीं शायद पूर्व जन्म का पुण्य अथवा मेरे माता-पिता बाबा दादी या कुल खानदान के किसी महापुरुष का पुण्य हो कि मुझे भी दरबार में सर रखने का अवसर लगातार मिला मैं जीवन भर यह प्रार्थना करता रहूंगा की मुझ पापी अकिंचन जीव पर हुजूर की करुड़ा बनी रहे उनकी अलौकिक गाथाओं को लिखने में उनका आशीर्वाद प्राप्त होता रहे

थानाध्यक्ष पर कृपा

“तुम जो देते हो तो काम मेरा चलता है
तेरे टुकड़ों पे मेरा खानदान पलता है”

आदित्य वाद के उपासक निर्गुण निराकार पर ब्रह्म का साक्षात्कार कराने वाले भगवत स्वरूप संत शिरोमणि साहेब बाबा की करुणा जब बरसती थी तो भीगने वाला तरबतर हो जाता था वह अपना सर्वस्व समर्पण करके  ऐसा हो जाता था कि मानो कि कबीर दास जी ने यह दोहा इसी के लिए लिखा

“कबीर कुकुर राम का मोतिया मेरो नाम।।
गले जेवरो राम को जीत खींचे तित जाव।।”

आधुनिक युग में पढ़ा लिखा व्यक्ति जब किसी असाध्य रोग से पीड़ित हो कर ना ना औषधियों का सेवन करके अनेक डॉक्टर वैध तथा हकीमो से उपचार करा कर तब उसे भागवत स्वरूप संत की याद आती हैऔर कृपा रूपी औषधि का तलाश करता है बिहार राज्य के सिवान जनपदांतर ग्राम सिसवन प्रखंड में ग्यासपुर नामक ग्राम में अपने जन्म भूमि पर श्री साहिब  बाबा निवास कर रहे थे तो एक दिन सिसवन थानाध्यक्ष साहिब  बाबा के दर्शन के लिए पधारे साथ में चार पांच पुलिसकर्मी थे हुजूर शिष्यों के साथ हास्य विनोद कर रहे थे दरवाजे पर पुलिसकर्मी को आया देख हुजूर ने अपने शिष्यों से पूछा कौन आया है शिष्यों ने कहा हुजूर पुलिस आई है हुजूर ने बड़े सरलतम और विनोद के भाव में भोजपुरी भाषा में एक वाक्य कहा (ये बाबू हम त अइसन कवनो काम ना करीले की पुलिस आवे )सभी शिष्य मुस्कुराने लगे थानाध्यक्ष हुजूर के चरणों में प्रणाम करके हुजूर के सनमुख बैठे और हुजूर से कुशलता का समाचार पूछा उसके पश्चात हुजूर भी थानाध्यक्ष महोदय से उनके परिवार की कुशलता पूछे थानाध्यक्ष ने कहा मेरा परिवार भी ठीक है हुजूर ने थानाध्यक्ष को प्रेमपूण्य दो चार अटपटी गालियां देकर कहे कि तुम्हारा बेटा कुछ महीनों से घर पर रोज खून की उल्टियां करता है और मरणासन अवस्था में पहुंच चुका है। फिर तुमने मुझसे झूठ क्यों बोला कि मेरा परिवार ठीक है इतना सुनते थाना अध्यक्ष महोदय हुजूर के चरण पकड़ कर रोने लगे साहिब बाबा ने उनसे कहा रोवो मत अब से लेकर जीवन प्रयन्त तुम्हारा बेटा स्वस्थ रहेगा और कभी खून की उल्टी नहीं करेगा थानाध्यक्ष के बेटा पुण्य रूप से स्वस्थ हो गया इस घटना के दो-तीन दिन बाद ही थानाध्यक्ष का तवादला हो गया परंतु उसके दो वर्ष बाद थाना अध्यक्ष महोदय ट्रकों में उपहार की सामग्री भर के स परिवार दीक्षा लेकर के हुजूर की शिष्तास्वीकार की।

साधक पर हुजूर की कृपा.
एक बार एक साधक जो लगभग तीस वर्षों से तंग साधना तथा भगवत साधना में रथ थे। परंतु उनके विक्रय भवारथ बुद्धि और कुटिलता के कारण उन्हें सफलता नहीं मिल रही थी साधना में असफल होने के बावजूद समाज में अपने आप को दिव्य रूप में स्थापित करने के लिए लोगों को अपने अध्यन जन अध्ययन जन तथा किताबी ज्ञान के द्वारा प्रभावित करने की कोशिश करते रहते थे तथा आम जनमानस और क्षेत्रवासियों के मध्य मे खुद को  सर्वश्रेष्ठ साबित करते थे दवीव संयोग से एक बार उनकी मुलाकात साहिब बाबा के एक शिष्य से हुई।वह शिष्य अत्यंत सरल प्रेम से संपूर्ण जातिवाद से परे निश्छल भाव से हुजूर को अपना सर्वस्य मान कर उन्हीं की विधि से बताई मंत्र जब और साधना करते थे उस शिष्य ने उन साधक के सनमुख श्री साईं बाबा के सामर्थ्य तथा महिमा का बड़े प्रेम से बखान किया उस साधक ने सोचा कि आज चलकर इसके गुरुदेव को अपने ज्ञान से पराजित कर दू वह साधक चलकर हुजूर के सनमुख आया तो उसने देखा कि हुजूर अपने शिष्यों के बीच में बैठे हुए हैं कमलवत चेहरे पर दिव्य कांति है तथा मंद मंद मुस्कुराहट अहंकार वस साधक ने हुजूर को प्रणाम करना उचित नहीं समझा और हुजूर से प्रश्न कर बैठा साधक का प्रश्न था “अथातो ” ब्रह्म जिज्ञासा अर्थात ब्रह्म क्या हैमैं आपसे जानना चाहता हूं हुजूर मुस्कुराते हुए अपने आसन से उठे और साधक के समीप जाकर अपने चरणों से जोरदार प्रहार किये हुजूर का शरीर असाधारण था लगभग सात फीट लंबा दिव्य कद काठी थी हुजूर की, हुजूर अजानवाहु तथा भगवत स्वरूप थे हुजूर के दृष्टि मात्र से न जाने कितनों को ब्रह्म ज्ञान हो जाता था परंतु हुजूर के चरणों के प्रहार से साधक बीस फीट दूरी पर जा गिरा और मूर्छित हो गया लगभग दस मिनट मूर्छा के बाद जब वह साधक उठा तो हुजूर के चरणों में गिर गया रोते हुए उसने कहा हुजूर आपकी कृपा से आज मेरी साधना एक पूरी हो गई और मुझे ब्रह्मानंद की अनुभूति हो गई मेरे ऊपर कृपा करके मुझे मंत्र दीक्षा प्रदान कीजिए मैं अपना सर्वत्र समर्पण करके आपकी सादता स्वीकार करता हूं परम कृपालु साहिब बाबा ने साधक के हृदय पर अपनी तर्जनी उंगली स्थापित करके उसे दीक्षा प्रदान की और मुस्कुराते हुए वह साधक हुजूर की सेवा में लग गया

दिनों पर हुजूर की करूणा.
शाश्वत सनातन धर्म में भारतवर्ष के पावन भूमि में अनेकानेक दिव्य संत हुए उन संतो ने जाति धर्म के प्रका रूप से ऊपर जाकर संपूर्ण विश्व का कल्याण किया पूज्य श्री साहिब बाबा संतो के सिर पर थे संत समाज ने उन्हें संत शिरोमणि के नाम से पुकारा था साहिब बाबा सदा सर्वदा विपन्य दुखिया दिन हीन तथा अकिंचन जीवो पर सर्वप्रथम कृपा करते थे। एक अत्यंत गरीब दंपति बाबा के चरणों में बहुत ही निष्काम तथा अवदितिम प्रेम रखते थे परंतु दंपति के पास गरीबी इतनी थी कि मानो उन्हें विरासत में मिली हो पति खेतों में मजदूरी करता था एक वक्त की रोटी जैसे तैसे मिल जाती थी रहने के लिए एक छोटी सी कुटिया(मड़ई ) थी उसमें भी गर्मी के दिनों में धूप ठंड के दिनों में सीत तथा वर्षा ऋतु में बरसात का पानी बिना किसी रोक-टोक के आता था परंतु उस गरीब दंपति की एक इच्छा थी उनके जीवन काल में एक बार हुजूर को भोजन करा सकें दीन तथा महीनों के मिली मजदूरी में से एक-एक पैसा उस दंपति ने अपने जरूरतों में कमी करके बचाई

“ढाई अक्षर प्रेम के सबने बाचे।
पर तीन अक्षर गरीबों को कोई ना पड़ सका।।”

खींचकर घूंघट करें तो पीठ दिखती पेट को जल्दी कहानी आंख लिखती बेर पकने को न आई पैर का काटा पका घर का हर कोना खाली हाथ जैसा फटे छत के छप्पर से गिरती दोपहर दो चार पैसा छुप के सिक्के पुराने रात को काली घटा कापती दीवार कच्ची उफनती है जब नदी दूर बहत से दूर होके सरक जाती हर सदी अब नहीं रोमांच कोई ना कोई फल सफा ढाई अक्षर प्रेम के सबने वाचे  पर तीन अक्षर गरीबों का कोई ना पड़ सका। ऊपर लिखी हुई पंक्तियां किसी लेखक ने मानो उस गरीब दंपति के जीवन का सजीव चित्रण किया हो इतनी विपन्नता में कुछ पैसे एकत्रित करके भोजन बनाकर उस गरीब दंपति ने एक दिन भोजन के लिए निमंत्रित किया और जैसे तैसे अपनी छोटी सी कढ़ाई में थोड़ी सी सब्जी और आठ दस रोटियां तैयार की हुजूर जब उस गरीब दंपति के दरवाजे पहुंचे तो हुजूर के साथ उनके दस पंद्रह शिष्य थे इतने शिष्यों के साथ  आया देखकर हुजूर को बैठा कर अपने रसोई में बैठकर पति-पत्नी रोने लगे  पति ने अपनी पत्नी से कहा कि इतनी गरीबी में जीवन की यही एक विशेष इच्छा रह गई थी कि साहिब बाबा हमारी कुटिया में बैठकर भोजन करें परंतु इतने शिष्यों के साथ आए हैं कि हम लोग सबको पेट भर भोजन भी नहीं करा पाएंगे इतना कह कर पति-पत्नी विलाप करने लगे तब परम कृपालु साहिब बाबा थोड़े से चलकर रसोई कच्छ में आए एक कपड़े से उसके भोजन के पात्र को ढक दिए और बोले इसी पात्र में से कपड़े को थोड़ा उठा उठा कर के भोजन निकालना और सब को भोजन कराना सभी लोगों के बाद तुम लोग भोजन कर लेना फिर अंत में कपड़े को हटाना बर्तन में बचे भोजन को जमीन में दबा देना ऊपर से मिट्टी डालकर पानी से लेपन  कर देना वह गरीब दंपति बाबा के सामर्थ्य और करुणा को भलीभांति जानते थे वह भोजन निकालती गई हुजूर तथा सभी शिष्यों ने पेट भर भोजन किया पति पत्नी हुजूर की कृपा और करुणा को देखकर आंखों में आंसू लिए अत्यंत हर्षित होकर प्रसाद पाया और हुजूर के आशीर्वाद से कुछ ही दिनों बाद वह दंपति पुनवान तथा धनवान हो गए।

विधवा के बेटी का ब्याह.
संत शिरोमणि श्री साहिब बाबा लीलाएं चमत्कार से परिपूर्ण हुआ करते थे उनके जीवन के प्रत्येक कदम पर कुछ न कुछ ऐसी घटनाएं घटती  थी जो लौकिक तथा वैज्ञानिक रीतियों से असंभव थी यद्यपि हुजूर अपने शक्तीयो को सदा सर्वदा पर्दे में रखना चाहते थे परंतु करुणामय  स्वभाव के कारण उनकी दिव्य शक्ति का आभास आम जनमानस को सहजता  पुण्य ढंग से हो जाता था।

संत हृदय नवनीत समाना
अर्थात संतों का हृदय नवनीत (मक्खन )की भांति कोमल होता है संत अपने दुख से कभी दुखी नहीं होते अपितु किसी निर्धन असहाय विप्पन प्राणी के दुखों को देखकर संत दुखी हो जाते हैं उनका हृदय प्रेम और करुणा से भर जाता है इसी करुणा युक्त स्वभाव के कारण साहिब बाबा को लोग करुणामूर्ति कहा करते थे उत्तर प्रदेश के देवरिया जिला के अंतर्गत गौरी नामक स्थान पर एक विधवा स्त्री रहा करती थी उसकी गोद में एक सुंदर सुकुमार सौंदर्य तथा संपूर्ण संस्कारों से युक्त बेटी भी थी पति के मृत्यु के पश्चात उस विधवा स्त्री की बेटी धीरे-धीरे विवाह के योग्य हो गई थी अपनी बेटी को विवाह योग्य देखकर धन के अभाव में उसकी मां चिंतातुर तथा शोकाकुल रहा करती थी एक दिन वह विधवा स्त्री संत शिरोमणि साहिब बाबा से मिलने के लिए आइ और अपने संपूर्ण ह्रदय वेदना को हुजूर के सम्मुख रोते हुए प्रस्तुत की हुजूर ने असवासन  दिया  और कहा कि तुम्हारी बेटी का विवाह निर्भीन्ता पुण्य ढंग से संपन्न होगा तुम अपने बेटी के योग्य वर ढूंढो शेष जिम्मेदारी मेरी होगी साहिब बाबा ने अपनी करुणामय दृष्टि उस विधवा  के परिवार पर डाली तो शीघ्र अति शीघ्र एक संस्कारी एवं सुंदर परिवार में उसकी बेटी का विवाह होना सुनिश्चित हो गया साहिब बाबा की कृपा से बरक्षा तिलक आदि कार्यक्रम सुचारू रूप से संपन्न हो गया विवाह के दिन साहिब बाबा उसके घर पधारे वर पक्ष से बारातियों की संख्या बहुत अधिक थी उस समय में सतुआ भुजा गुड़ सब्जी चावल इत्यादि खिलाकर बारातियों का स्वागत किया जाता था लोगों को लगा कि इतने बारातियों को भोजन नहीं करा पाएंगे तब परम करुणामय भगवत स्वरूप साहिब बाबा ने एक बड़े से पात्र में अपने हाथों से ढाई किलो चावल डाले लोगो ने कहा बारातीओ की संख्या पांच सौ है तो ढाई किलो चावल मे सब लोग कैसे भोजन कर पाएंगे परन्तु उसी ढाई किलो चावल मे सम्पूर्ण बारातीओ ने पेट भर भोजन किया तीन दिन तक बारात जनवास रुकी और अक्ष्य पात्र की भाती तीन दिनों तक ताजे चावल और सब्जिया सभी बारातीओ को निकाल करके खिलाया गया साहिब बाबा की अलौकिक कृपा को देख कर सम्पूर्ण ग्रामवासिओ ने उनके चरणों मे वंदना की तथा उनकी शिस्ता स्वीकार की बारात सकुशल कन्या को लेकर ससुराल गई और हुजूर की कृपा से उस कन्या ने अखंड सौभाग्य के साथ नाना वैभव सम्पति और पुत्र पैात्र आदि के साथ साहिब बाबा की चरणों की भक्ति करते हुये अत्यंत प्रसंता पूर्वक अपना जीवन यापन किया।